हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , 25 सितंबर को मुंबई ,खोजा शिया अशना अशरी जामा मस्जिद, पाला गली में मौलाना सैयद अहमद अली आबिदी की इमामत में नमाज़-ए-जुमा अदा की गई। नमाज़ से पहले खिताब करते हुए उन्होंने इमाम-ए-जमाना हज़रत वली-ए-अस्र (अ.) के ज़ुहूर में तजील, दुनिया से जुल्म व अत्याचार के खात्मे और अद्ल व इंसाफ की स्थापना के लिए दुआ की।
मौलाना सैयद अहमद अली आबिदी ने कहा कि इंसान जिस दुनिया में जिंदगी गुजार रहा है, वह अस्थायी है, जबकि आखिरत उसकी वास्तविक और हमेशा रहने वाली मंजिल है। दुनिया में इंसान को जो कुछ हासिल है, उसे आखिरत की तैयारी और नेक कामों के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। उन्होंने सूरह अल-बक़रा की आयत 254 का हवाला देते हुए कहा कि अल्लाह की दी हुई नेमतों में से उस दिन के आने से पहले खर्च करना चाहिए, जब न व्यापार काम आएगा, न दोस्ती और न ही दुनिया के रिश्ते।
उन्होंने कहा कि इंसान का माल, दौलत, मकान, संपत्ति और दूसरे संसाधन ही नहीं, बल्कि उसकी बुद्धि, याददाश्त, जुबान, हाथ, पैर और दूसरी क्षमताएं भी अल्लाह की दी हुई नेमतें हैं। इंसान जो कुछ कमाता है, वह भी इन्हीं क्षमताओं और संसाधनों के माध्यम से कमाता है। इसलिए उसे चाहिए कि अल्लाह की दी हुई नेमतों में से जरूरतमंदों और नेक कामों के लिए भी हिस्सा निकाले।
सदक़ा व खैरात की अहमियत बयान करते हुए मौलाना आबिदी ने कहा कि अल्लाह की राह में खर्च करने से माल कम नहीं होता, बल्कि उसमें बरकत पैदा होती है। उन्होंने पेड़ की मिसाल देते हुए कहा कि जिस तरह कुछ शाखाओं की छंटाई के बाद नई शाखाएं और पत्ते निकलते हैं, उसी तरह अल्लाह की राह में माल खर्च करना भी बरकत और भलाई का जरिया बन सकता है।
उन्होंने मोमिनों को शिक्षा, इलाज, यतीमों, विधवाओं और अन्य जरूरतमंदों की मदद की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि सक्षम लोगों को चाहिए कि वे अपने समाज के जरूरतमंदों का सहारा बनें। किसी बच्चे की फीस, किसी मरीज के इलाज या किसी जरूरतमंद परिवार की आवश्यकता पूरी करने के लिए किया गया सहयोग न केवल सामाजिक जिम्मेदारी की अदायगी है, बल्कि आखिरत के लिए भी नेक अमल का पूंजी है।
मौलाना आबिदी ने सहम-ए-इमाम और अन्य शरई अमवाल के इस्तेमाल के बारे में कहा कि शरई अमवाल अपनी निर्धारित शरई जिम्मेदारियों के अनुसार खर्च किए जाते हैं। हालांकि इंसान को अपनी आखिरत के लिए अपने निजी हलाल माल से भी सदक़ा व खैरात करना चाहिए। उन्होंने जोर दिया कि हर व्यक्ति जरूरतमंदों की मदद और नेक कामों में अपनी ओर से हिस्सा लेने को अपनी स्थायी जिम्मेदारी समझे।
उन्होंने आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली सीस्तानी की सादा जिंदगी और निजी माल के इस्तेमाल के संबंध में बताई गई मिसाल का उल्लेख करते हुए उपस्थित लोगों को प्रेरित किया कि इंसान अपनी जरूरतों में संतुलन रखे और अपनी क्षमता के अनुसार अतिरिक्त संसाधनों को नेक कामों में खर्च करे।
मौलाना सैयद अहमद अली आबिदी ने कहा कि आर्थिक हालात बेहतर होने के बावजूद यदि सक्षम लोग जरूरतमंदों की मदद से गाफिल रहें तो समाज में दूसरों पर निर्भरता का रुझान बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि जरूरतमंदों की शिक्षा, इलाज और बुनियादी जरूरतों में सहयोग करना समाज के संपन्न लोगों की महत्वपूर्ण सामाजिक जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि आखिरत में इंसान के साथ वही कर्म जाएंगे, जिन्हें उसने दुनिया से आगे भेजा होगा। इसलिए हर व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार, चाहे एक रुपया ही क्यों न हो, हलाल माल से सदक़ा व खैरात करने और जरूरतमंदों की मदद को अपनी आदत बनाना चाहिए।
खिताब के अंत में मौलाना सैयद अहमद अली आबिदी ने दुआ की कि अल्लाह तआला सभी मोमिनों को हलाल रिज्क, उसमें बरकत और अपनी दी हुई नेमतों को सही जगह इस्तेमाल करने की तौफीक अता फरमाए, जरूरतमंदों की मदद करने की तौफीक दे और इमाम-ए-जमाना हज़रत वली-ए-अस्र (अ.स.) के ज़ुहूर में तज़ीील फरमाए।
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